Friday, August 07, 2009

नीड़ का निर्माण फिर फिर - Need ka Nirman fir fir

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License.

नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर

यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा
धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण
किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर .....

क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती
घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं
वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती
नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर....

कवी - हरिवंशराय बच्चन

One of my favorite poems cherishing eternal optimism and a spirit of never-say-die... Awesome and extremely rhythmic composition.

4 comments:

Karmasura said...

Could not get a few words in the above poem.. can we have a translation please??

Btw, I thought you would be interested in this stuff..

1) http://theswadeshidonquixote.blogspot.com/2009/08/buddhism-as-trojan-1.html

2) http://theswadeshidonquixote.blogspot.com/2009/08/buddhism-as-trojan-2.html

It's a 2 part series by me on how Buddhism can be a trojan in the hands of the West.

Satya said...

One of my fav poems too :) we learnt it in school...

Anu said...

A poem that always gives me inspiration whenever i feel low.

Shalini Gupta said...

The best line ever in the poem is "Vinash ke bhay se kabhi dabta nahi nirmaan ka sukh"